First Urban forest comes up in Dwarka

The first Urban forest comes up in Dwarka Sector 7 with support from Earth Day Network as part of our Great Global Cleanup Heroes campaign, using Miyawaki Technique on 29th Aug 20. Environment enthusiasts came together to plant 180 trees using the Japanese technique in the green belt adjoining Brahma Apartments in sector 7 Dwarka. Native trees like Neem, Jamun, Amla, Peepal, Guava, Mango, Karonda, Kaner, Bamboo, Calandera etc. were planted. Using this technique, plants grow very fast and the success rate of tree survival is more than 70%. The oxygen content of the area using this method is 30% more as compared to traditional method of tree plantation.

The Project was led by Sh Madhukar Varshney and team members (Madhuri Varshney, Deepak Bhardwaj & Munish Kundra) from Rise foundation, a Great Global Cleanup participant towards our Earth Day Heroes competition.

The occasion was graced by Palam Vidhana sabha MLA Sushree Bhawna Gaur, Dr Indra Mani (Senior Scientist, IARI), Sh. Selva Rajan founder of Green Circle, Sh. Ramesh Mumukshu, Environmentalist and several other environment enthusiasts. This project is based on #communityengagement and was crowd funded. We are very much thankful to all generous donors whose contribution and blessing made this project a successful one. We also pay are gratitude to Management of #brahma #apartment #sec7 for their whole hearted support.

Miyawaki Forest Planted in Kanganheri ,Delhi

Miyawaki method based forest development and plantation drive was organized at Kanganheri Village, near Dwarka, New Delhi on 12th July 2020 by RISE Foundation along with villagers and nature lovers. 350+ saplings were planted at the location.

Why Plantation ?

Global warming and its aftermath is an undeniable fact which has become a regular occurrence, affecting all and sundry. Air, land and water quality is deteriorating day by day. Flora and fauna worldwide are threatened with extinction. Nations are ravaged by floods or famine. The groundwater level is fast depleting, while sea levels are rising. Seasons have become imbalanced and unpredictable. Increasing temperature of the Earth is posing many challenges. India’s economic growth is also threatened by the adverse impact of climate change. Under such circumstances only option available to secure our future is to expand green cover of the Earth on a war footing.

RISE Foundation adopted unconventional method of plantation called Miyawaki Method. In this , before plantation, land is required to be prepared properly. D. Akira Miyawaki, a botanist and expert in plants ecology invented this unique method of plantation. In Miyawaki method multi-layered saplings are planted close to each other. This blocks sunlight from reaching the ground and prevents weeds from growing, thus keeping the soil moist.

The entire area marked for this method is dug up to a depth of one metre. Soil texture should be checked as this helps in determining appropriate amount of perforator (rice, wheat or corn husks), fertilizer (organic manure), water retainer (coco peat or dry sugarcane stalks) and mulch (rice, wheat straws, corn or barley stalks). They enhance soil quality, resulting in a successful outcome. This treatment makes it possible to plant an unbelievable number of 300-500 trees of 20-25 species in a plot of just 100 sq. metres. This method requires the planted area to be given attention like watering and removing weeds for just two to three years. It thus becomes self-sustaining in hardly three years, requiring no further treatment or nurturing.

Action on a War Footing

The project is completed in record time of 10 days from ground preparation till Plantation. RISE Foundation team comprises Madhukar Varshney, Madhuri Varshney, Munish Kundra and Youth leader Deepak Bhardwaj supervised the project till end. Post deployment – RISE Foundation will do regular visit and maintenance of the place for next 3 years till it become self sustainable forest.

Citizens’ Response

The new experiment undertaken by RISE Foundation, is eliciting a positive response from all sections of villagers . The most of the consumable items are donated by Villagers and well supported the cause. As everybody realised that is unique and first such project in whole Matiala Vidhansabha and Kanagaheri Village. This is one of the good example of citizen engagement and collaboration.We expect in future that School and college students, voluntary organizations and other citizens will visiting the mini-forest and getting trained in this method.

We are looking forward to plant more such #urban #forest in coming days.

घर में खाद बनाने का क ख ग

शहरी और ग्रामीण भारत में कचरा जलाना एक बड़ा मुद्दा है।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों से पता चलता है कि 7 अक्टूबर से 21 नवंबर, 2019 के बीच प्रदूषण मानक उल्लंघन की 2,900 शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें से, 966 शिकायतों में कचरा जलाने और कचरे के खुले डंपिंग के मामले शामिल थे। अफसोस की बात है कि 80 फीसदी से ज्यादा कचरा जैविक होता है, जिसे स्थानीय क्षेत्र में खाद बनाकर लैंडफिल में जाने से आसानी से बचाया जा सकता है ।

जैविक कचरे में रसोई से निकलने वाला कचरा, बचा हुआ भोजन, सब्जी और फलों के छिलके, पत्तियां, प्रयुक्त चाय के अवशेष, अंडे के छिलके और फूल आदि शामिल हैं।

खाद पोषक तत्वों से भरपूर ह्यूमस (एक भूरा काला (Brownish-Black) मोम सदृश (Waxy) कार्बनिक पदार्थ (Organic Matter))  में कार्बनिक पदार्थ को तोड़ने की प्रक्रिया है। यह सड़ने से अलग है क्योंकि सड़ने में क्षय होता है, साथ में गंध और फफूंद होता है, जबकि खाद धीमी गति से विघटित होती है – यह प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से जंगलों में होती है, जहाँ पत्तियों की परतें धीरे-धीरे टूटकर दोमट मिट्टी का हिस्सा बन जाती हैं, जो आपको “वन गंध”देती हैं।

खाद बनाने के दौरान, कार्बनिक पदार्थ नाइट्रोजन और कार्बन में टूट जाते हैं, और जब ये दोनों संतुलित होते हैं, तो आपको खाद मिलती है। बहुत अधिक नाइट्रोजन पदार्थ को सड़ने देगा; बहुत अधिक कार्बन मिश्रण को शुष्क और निष्क्रिय बनाता है।

नाइट्रोजन हरे कचरे से आता है – सब्जी और फलों के छिलके, फूल, बचा हुआ भोजन। कार्बन भूरे रंग के कचरे से आता है – सूखे पत्ते जो पेड़ों से गिरते हैं, कटा हुआ कार्डबोर्ड, भूरे नारियल के टुकड़े (बाहर का सख्त कवर नहीं)

कंपोस्टिंग एरोबिक या एनारोबिक (अवायवीय) हो सकता है, खाद बनाने का सबसे सरल तरीके में हवा शामिल है, जो जैविक कचरे के पात्र (कंटेनर/कम्पोस्टर) में छिद्रों के माध्यम से और समय समय पर इस मिश्रण को चर्नर की सहयता से हिलने से खाद बनाने में सहायक होती है ।

घर पर खाद कैसे बनाये ?

शुरुआत के लिए, आपको एक कंटेनर – ड्रम, टेराकोटा पॉट, प्लास्टिक बाल्टी आदि … चाहिए। आप जो भी उपयोग करते हैं, बस हवा के संचलन के लिए कंटेनर पर उचित मात्रा व् दूरी पर छेद बनाते हैं।

सभी हरे कचरे को इकट्ठा करें और दिन में एक या दो बार कम्पोस्टर में डालें । यदि संभव हो, तो तेजी से खाद बनाने के लिए छिलके और अन्य कचरे को छोटे टुकड़ों में काट लें। अब, नाइट्रोजन और कार्बन के संतुलन को बनाने के लिए – भूरे कचरे यानि कॉकपिट या सूखी पतियों इत्यादि को भी कम्पोस्टर में डालें ।

हर मुट्ठी में ’हरे’ कचरे के लिए, मुट्ठी भर भूरे ’कचरे को जोड़ें। सुनिश्चित करें कि भूरे कचरे की एक परत कचरे की ऊपरी परत को कवर करती है। कंपोस्टिंग पॉट को ठीक से ढंके , ताकि छोटे जीव जंतु अंदर न जा सकें। किसी भी तरल को इकट्ठा करने के लिए एक प्लेट नीचे रखें – ये तरल मुखतय प्लास्टिक के कपोस्टर में निकलेगा जबकि टेराकोटा या मिटटी के बने कम्पोस्टर में ये नहीं निकलता क्योंकि मिटटी का पॉट  किसी भी नमी को हवा में वाष्पित कर देता है ।

जैसे ही जैविक कचरे का मिश्रण टूटना शुरू होता है, एक भूरा तरल प्राप्त होता है, जिसे लिचेट खा जाता है । यह तरल पदार्थ उर्वरक के रूप में पौधों में प्रयोग किया जाता है क्योकि इसमें पौधों के लिए बहुत अधिक पोषक तत्व होते है  (1-भाग लिचेट को  30 भाग पानी में मिला के उर्वरक के रूप में प्रयोग करें )।आप दही के एक चम्मच, पंचगव्य (जीवमृत) या गोबर के घोल को इस जैविक कचरे में मिलाकर , जीवाणुओं को पैदा कर, खाद बनाने की प्रोसेस को तेज कर  सकते हैं।

कम्पोस्टर पॉट  में हरे ’और‘ भूरे ’कचरे को तब तक मिलाते रहें, जब तक वह भर न जाए। फिर दूसरा पॉट शुरू करें। हर दो या तीन दिन में, मिश्रण में हवा के प्रवाह के लिए इसे हिलाएं। पूरे भरे पॉट को खाद बनने के लिए छोड़ दें। छह से आठ सप्ताह के बाद, जब आप बर्तन को खोलते हैं, तो आपको इससे गीली मिटटी की तरह की गंध आएगी ।आपका भूरा सोना आपके पौधों में डलने के लिए तैयार है।

इनसे बचें

कम्पोस्टर पॉट में इनको डालने से बचे – नारियल के गोले, आम के बीज और मूंगफली के गोले को सड़ने में लगभग एक साल लगता है। यदि आप इन्हें मिश्रण में शामिल करते हैं, तो वे एनारोबिक पॉकेट बनाते हैं जो गंध करना शुरू कर देंगे। डेयरी/दूध से बना कचरा चूहों को आकर्षित करता है। हड्डियों को सड़ने में लंबा समय लगता है, इसलिए इससे बचा जा सकता है। कुचल अंडे का छिलका कैल्शियम का एक अद्भुत स्रोत है और इसे सीधे रोपण मिट्टी में डाला जा सकता है, जैसा कि प्रयोग की गयी चाय और कॉफी को सीधे भी मिट्टी में मिलाया जा सकता है ।

समस्या निवारण

खाद न तो ज्यादा गीली और न ही ज्यादा सूखी होनी चाहिए , और इसमें से गीली मिटटी के जैसी गंध आणि चाहिए । यदि ये बहुत ज्यादा नम है , तो इसका मतलब है कि वहाँ बहुत अधिक नाइट्रोजन है। कुछ भूरे कचरे  जैसे कोकोपिट या सूखी पत्तियों को डालें । यदि यह सूखा दिखता है, तो हरे कचरे की एक खुराक जोड़ें। सबसे अधिक समस्या तब होती है जब खाद नम होती है और सड़े हुए कचरे की गंध देती है ।

खाद में मैगॉट्स होने लगते है । सफेद  या काले कीड़े खौफनाक दिख सकते  हैं और कई लोगों को आगे खाद बनाने से रोक देते है । लेकिन समाधान आसान है। हल्दी और मिर्च पाउडर डालें और फिर नमी को कम करने के लिए चूरा, कोकोपीट या सूखी पत्तियां डाले । यह हरे और भूरे कचरे के बीच संतुलन के बारे में है – इसका ध्यान रखे।

फल और सब्जी के छिलके से फल मक्खियां हो जाती है , अगर आपकी खाद/जैविक कचरे में नमी होती है, तो ये मक्खियाँ अंडो से व्यस्क्त हो जाती है ।ऐसी स्तिथि में सूखे पत्ते जोड़ें और सुनिश्चित करें कि कम्पोस्टर के ढक्कन को ठीक से बंद रखे ।

खराब गंध आमतौर पर तब  आती है हैं जब मिश्रण बहुत नम (गीला) होता है। लेकिन यह भी हो सकता है कम्पोस्टर पॉट में कुछ हवा के संचलन को रोक रहा हो । सुनिश्चित करें कि कम्पोस्टर पॉट में कोई प्लास्टिक, नारियल के छिलके  या आम की गुठली न हों।

छोटा सा प्रयास

खाद बनाने के लिए आपको बहुत अधिक स्थान या समय की आवश्यकता नहीं है। दिन में पाँच मिनट लगते हैं। खुद को याद दिलाना महत्वपूर्ण है कि खाद के साथ सबसे आसान काम यह है कि इसे छोड़ दें। सबसे आनंद की चीज मिटटी की गंध को महसूस करना है, और अप्प ही ये जानते है की आप स्वस्थ पौधे उगाने में योगदान कर  रहे है और इस जैविक कचरे को लैंडफिल में न भेजने में सफल हो पा रहे हैं।

लेखक : मधुकर वार्ष्णेय ( टीम – राइज फाउंडेशन)

Home composting- So easy to do!!

Garbage burning is a big issue in Urban as well as in rural India. Data by Central Pollution Control Board (CPCB) shows that between October 7 and November 21, year 2019, 2,900 complaints of pollution norm violations were recorded. Out of these, 966 complaints comprised cases of garbage burning and open dumping of waste. Sadly, more than 80 per cent of the waste is organic, which can be diverted from the landfill simply by composting within the local area.

Organic waste includes waste from the kitchen, leftover food, vegetable & fruit peels, leaves, used tea residue, egg covers and flowers etc.

Composting is the process of breaking down organic matter into nutrient-rich humus. It is different from rotting because while rotting is decay, accompanied by putrid smell and fungus, whereas composting is slow decomposition — the process that takes place in forests naturally, where layers of leaves slowly break down to become part of the loamy soil, giving you that “forest smell”.

During composting, organic matter breaks down into nitrogen and carbon, and when these two are balanced, you get compost. Too much nitrogen will make the matter rot; too much carbon makes the mix dry and inert.

Nitrogen comes from the green waste — vegetable and fruit peels, flowers, leftover food. Carbon comes from the brown waste — dry leaves that fall from trees, shredded cardboard, brown coconut shreds (not the shell).

While composting can be aerobic or anaerobic, the simplest way to compost involves air, introduced into the mix through vents in the composting bin and through an occasional stir.

Composting at home

For starters, you need a container — drum, terracotta pot, plastic bucket…. Whatever you use, just make holes at regular intervals for air circulation.

Collect all green waste and deposit into the composting bin once or twice a day. If possible, chop peels and other waste into small pieces for faster composting. Now, gather the brown waste together.

For every handful of kitchen or ‘green’ waste, add a handful of ‘brown’ waste. Ensure that a layer of browns covers the top layer of the pot. Cover the composting pot tightly, so that small creatures can’t get in. Place a plate underneath to collect any liquid that flows out.

As the mixture starts to break down, a brownish liquid discharge, which is the leachate. It is very high in nutrients for plants and can be used as liquid fertilizer when diluted (1-part leachate to 30 parts water).

You can give it a boost by injecting the mixture with a spoon of yoghurt, panchagavya (Jeevamrut) or cow dung slurry. This adds microbes to kick-start the composting.

Keep adding ‘green’ and ‘brown’ waste to the pot till it fills up. Then start another pot. Every two or three days, stir to add air into the mix. Leave the filled pot closed to “sit”. After six to eight weeks, when you open the pot, it will smell like damp earth ( mann vasanai). Your brown gold is ready to feed your plants.

Avoid these in compost

Coconut shells, mango seeds and peanut shells take nearly a year to decompose. If you add these to the mixture, they create anaerobic pockets that will start to smell. Dairy attracts rodents. Bones take a long time to decompose, so can be avoided. Crushed eggshells are a wonderful source of calcium and can be directly added to the planting soil, as can tea and coffee dregs.

Troubleshooting

Compost is neither wet nor dry, and should smell like damp earth. If your pot looks soggy, it means there’s too much nitrogen. Toss in some browns like cocopeat or dry leaves . If it looks dry, then add a dose of green waste. The most problems happen when the compost is soggy.

Maggots will start to multiply in the compost. White worms or black grubs are creepy (you can even hear them sometimes) and have stopped many people from further composting. But the solution is easy. Add turmeric and chilli powder and then add sawdust, coco peat or dry leaves to draw out the moisture. Again, it’s all about the balance between greens and browns.

Fruit flies, from fruit and vegetable peels, become adults in your compost bin if the conditions are wet. Add dry leaves and make sure the compost drum is covered with a lid.

Bad odours are usually because the mix is too damp (slightly wet). But it could also be because something is blocking the circulation of air. Ensure that there is no plastic, coconut shells, or mango seeds in the compost drum.

Not much effort

You don’t need a lot of space or time to compost. It takes five minutes a day. It is important to remind yourself that the easiest thing to do with composting is to give it up. The most rewarding thing is to smell and feel the earth, and to know that you contributed to healthy plants and to keeping resources out of landfills.

For more information, feel free to reach RISE Foundation at 9717096635 or 9810073128 or mail at : mail2risefoundation@gmail.com

Source : The Hindu

Time to implement Mandatory waste Segregation at Source to Break the chain of COVID-19

Current lockdown in countries is essential to prevent the spread of the deadly coronavirus are dramatically transforming people’s daily lives across the world. One thing that remains unchanged is that we continue to produce massive amounts of waste each day.

Delhi generates 14000 tonnes all type of waste per day. There is no official data available on how many city households separate their waste before going this waste to landfills.

The need for implementing and ensuring segregation of waste at source is must during the coronavirus (COVID-19) outbreak in country, said by Madhuri Varshney – A social activist and Founder of RISE Foundation Social Organisation. This habit will not only reduce dumping of waste in landfills and oceans but will also play a crucial role in fighting with COVID-19.

“There should be no handling of garbage with bare hands”. She also urged the municipality to supply safety kits which contain gloves, mask, hand wash/sanitiser bottles to all workers and ragpickers and educate them on how to handle household waste during the outbreak, to help in halting the chain of transmission of COVID-19.

Municipality must revoke the SWM2016 again in Delhi-NCR and advised to citizens to dispose of their garbage in three categories – Compostable/Wet/Kitchen waste (food and other organic waste), Dry/Recyclables waste (metal cans, all size PET/HDPE plastic bottles and other heavy plastic objects, cardboards) and Biomedical waste (tissues, masks, gloves, sanitizer bottles). People need to dispose of their used napkins, tissues, empty sanitizer bottles in a separate bag, to ensure the safety of municipal workers and ragpickers.

Madhuri Varshney shared viewpoints on importance of waste segregation at source and awareness of residents why this is need of hour. She said if we sensitive towards our current COVID-19 situation and care our environment then we must initiate our own without having dependency on government machinery. A single step one day will become a revolution.

#lockdown #corona #COVID-19 #RISEFoundation #Waste #WasteManagement #MCD #SDMC #Delhi #wastepickers #ragpickers

Make 100% Organic Compost at Home using Kitchen Waste

1. Get an earthen pot or plastic bucket or Plastic drum with lid of 40 -60 lt* with air holes (*Note: Usually 500- 700 gm per day waste per household )
2. Segregate Kitchen/Food/Wet waste ( Fruit ,Vegetable, Tea, Egg shells, any leftover cooked food) from Dry Waste ( Paper, Plastic , any other ) and add into the bucket.
3. Add layer of dry leaves or cocopeat to absorb moisture over wet waste in the pot/bucket
4. Churn the waste on every 3rd or 4th day using Rak or similar tool in the pot/bucket
5. Add daily wet waste in to the pot/ bucket and follow the steps 2 to 4 till 30 days
6. Hurray – After 30 days – get Organic Compost

For more information about Waste Management mail us at mail2risefoundation@gmail.com
Or call us at : + 91 9717096635 or +91 9810073128